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हिमाचल की 5000 साल छुपी विरासत: रौलेन फेस्टिवल की रहस्यमयी दुनिया 🌄

🏔️ 5000 साल पुराना रौलेन: पहाड़ों की अनकही कहानी क्या आप जानते हैं कि दुनिया में ऐसे भी त्यौहार हैं, जिनकी उम्र का कोई अंदाज़ा ही नहीं है? हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हर साल मनाया जाने वाला ‘रौलेन’ उसी तरह का है। जब सर्दी कम होने लगती है, गाँव के लोग एक प्राचीन परंपरा […]

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🏔️ 5000 साल पुराना रौलेन: पहाड़ों की अनकही कहानी

क्या आप जानते हैं कि दुनिया में ऐसे भी त्यौहार हैं, जिनकी उम्र का कोई अंदाज़ा ही नहीं है? हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हर साल मनाया जाने वाला ‘रौलेन’ उसी तरह का है। जब सर्दी कम होने लगती है, गाँव के लोग एक प्राचीन परंपरा को फिर से जीते हैं। इस त्योहार की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसकी कोई लिखित कहानी या सबूत नहीं मिलता। लोग कहते हैं, यह परंपरा आज से करीब 5000 साल पहले शुरू हुई थी और तब से बिना रुके, बिना किसी बदलाव के चलती आ रही है।

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❄️ शुरुआत का रहस्य

रौलेन की कोई पक्की शुरुआत नहीं मिलती। न कोई धर्मग्रंथ, न ही कोई बड़ी कहानी। यह परंपरा बस गाँववालों की यादों और मान्यताओं का हिस्सा बन गई है। कहते हैं, इस उत्सव की शुरुआत पहाड़ की सौनी (लोक परियाँ और आत्माएँ) के सम्मान में हुई थी। लोग हर साल फूल, दूध, और छोटी-छोटी चीजें इन सौनियों को भेंट करते हैं—ताकि उनका आशीर्वाद गाँव, खेत और मवेशियों पर बना रहे। कुछ लोग बताते हैं कि सौनी लोग बर्फीले पहाड़ों की रखवाली करती हैं, और ये उत्सव उन्हें खुश करने का तरीका है।

👥 ‘रौला’ और ‘रौलेन’: त्योहार के स्टार

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रौलेन उत्सव में दो मुख्य किरदार होते हैं—रौला और रौलेन। ये दोनों लड़कों द्वारा निभाए जाते हैं, लेकिन इनमें रौला उजाले का, और रौलेन वेदना व शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं। इनका चेहरा हमेशा ढका रहता है, भारी गहनों और फूलों की माला से। हाथों में दस्ताने और सिर पर रंगीन टोपी—लोग मानते हैं कि चेहरा दिख गया तो इनकी शक्ति कम हो जाएगी।

🚶‍♂️ विलुप्त परंपराएँ: झनपुंदुलु का रोल

जब रौला और रौलेन मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं, उनके साथ चलते हैं ‘झनपुंदुलु’—ये हैं गांव के लड़के, डरावने नकाब पहन कर। इनका काम है बुरी आत्माओं को दूर भगाना। बच्चे इन्हें जिज्ञासा से देखते हैं, तो बड़े आदर में सिर झुका लेते हैं। घरों से निकल कर पूरा गाँव जुलूस के साथ मंदिर पहुँचता है।

🕉️ मंदिर में रौलेन का डांस: अद्भुत रसम

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मंदिर पहुँचना सिर्फ जुलूस का अंत नहीं, बल्कि असली रौलेन की शुरुआत का वक़्त है। मंदिर के आँगन में शुरू होता है गहरा, धीमा, और बेहद मन से किया जाने वाला डांस। इसी दौरान मान्यता है कि इंसानों और आत्माओं की दुनिया के बीच का पर्दा पतला हो जाता है। आस-पास के लोग ये नृत्य परियों की विदाई और अगले साल उनकी वापसी की प्रार्थना के तौर पर देखते हैं।

🎞️ वीडियो में देखें हिमाचल का रौलेन

इस Instagram वीडियो में मेले की असली झलक देखें:

❤️ रौलेन पर्व: क्यों है इतना खास?

हिमाचल के गाँववालों के लिए रौलेन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चलती यादों, आस्था और प्रकृति से जुड़ेपन का जरिया है। आज जब अगली पीढ़ी मोबाइल और इंटरनेट में खो रही है, रौलेन अब भी पूरी श्रद्धा से मनाया जाता है। यहां कोई कागज, किताब, या खोखली कहानी नहीं—बस पहाड़ों की आत्मा से निकली पुरानी फुसफुसाहट है, जो हर साल फिर से जी उठती है।

यही है रौलेन का असली जादू—क्योंकि ये पर्व लोगों का नहीं, बल्कि पहाड़ों और प्रकृति की आत्मा का हिस्सा है। शायद इसीलिए, इतनी सदियाँ बीत जाने के बाद भी, यह परंपरा कभी थमी नहीं और आगे भी यूँ ही चलती रहेगी।

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